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बुद्ध के ज्ञान की धरती – बौध गया

बुद्ध के ज्ञान की धरती – बौध गया

“बुद्धम शरणम गच्छामि” की ध्वनि गूंजती है यहां. बुद्ध के संदेश यहां की धरती को पावन करते हैं. किसी समय का मगध और आज का बिहार एक वक्त में उन्नत बुद्धिजीवियों, कला और संस्कृति का केंद्र हुआ करता था. इतिहास के पन्नों में दर्ज ये जगह मौर्य वंश की राजधानी पाटलिपुत्र हुआ करती थी. चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक के साम्राज्य के साथ ही चाणक्य और आर्यभट्ट जैसे महान विद्वान यहां से निकले. इसके साथ ही बिहार का ऐतिहासिक महत्व गौतम बुद्ध की नगरी के रूप में और बढ़ गया.

बौद्ध धर्म का सर्वोच्च स्थान रहा बौध गया

अपने देश के इतिहास को देखे तो बौद्ध धर्म के चार मुख्य केन्द्र रहे -लुम्बिनी, कुशीनगर, सारनाथ और बोध गया. इन चारों में बोध गया सबसे महत्वपूर्ण माना गया है क्योंकि यहीं से सिद्धार्थ का नाम गौतम बुद्ध हुआ और बौद्ध धर्म की नींव पड़ी थी.

महाबोधि मंदिर

बोध गया में देखने लायक दो जगह है – महाबोधि मंदिर और अस्सी फीट ऊंची गौतम बुद्ध की मूर्ति. ऐसा कहा जाता है कि इस मंदिर के पीछे जो पीपल का पेड़ है उसी के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी. पीपल का ये पेड़ जो आज दिखता है वो हजार वर्ष पुराने उसी पेड़ के पांचवी पीढ़ी का वंशज है, जिसके नीचे बुद्ध ने तपस्या की थी.

सम्राट अशोक ने बनवाया महाबोधि मंदिर

बुद्ध के समय से ढाई सौ साल बाद सम्राट अशोक ने इस महाबोधि मंदिर को बनवाया था, लेकिन कुछ इतिहासकार इससे सहमत नहीं है हालांकि कहा जाता है कि देश में बौद्ध धर्म के पतन के साथ ही इस मंदिर का अस्तित्व धूल-मिट्टी में दबकर धीरे-धीरे ख़त्म सा होने लगा था और लोग इसे भूलने लगे थे तब उन्नीसवी सदी की खुदाई में इसे फिर से पुर्नजीवित किया गया. साल 2002 में इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व विरासत भी घोषित किया.

महाबोधि मंदिर पूरी तरह सुरक्षित

महाबोधि मंदिर परिसर को पूरी तरह से सुरक्षा घेरे में रखा गया है ताकि इस ऐतिहासिक धरोहर को कोई नुकसान न पहुंचा सके. यहां अन्दर जाने के लिए मोबाइल-कैमरा आदि छोड़ कर ही जाना पड़ता है लेकिन अगर कोई कैमरा ले ही जाना चाहते हों तो उसके लिए टिकट लेना पड़ता है. मंदिर को खूबसूरत बगीचों से सजाया गया है यहां आने वाले ज्यादातर पड़ोसी देशों के बौद्ध अनुयायी होते हैं.

बुद्ध पूर्णिमा पर खास रौनक

यूं तो महाबोधि मंदिर में पूरे साल श्रद्धालु आते हैं लेकिन बुद्ध पूर्णिमा पर बोध गया की रौनक चरम पर होती है. मंदिर के पीछे एक छोटा सा बाज़ार है जहां बुद्ध से जुड़ी चीजें मिल जाती हैं. शाम के वक़्त मंदिर को रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जाता है.

अस्सी फीट ऊंची बुद्ध प्रतिमा

महाबोधि मंदिर के साथ ही यहां का सबसे बड़ा आकर्षण करीब एक किलोमीटर पैदल दूरी पर बुद्ध की अस्सी फीट ऊंची प्रतिमा है. अस्सी के दशक में इसे बनवाया गया था. बुद्ध की ध्यान मुद्रा वाली ये मूर्ति चूना पत्थर और लाल ग्रेनाइट की बनी है. यही नहीं बुद्ध की मूर्ति के चारों ओर उनके दस शिष्यों की भी खड़ी मूर्तियां स्थापित की गई हैं. यहां पर प्रवेश बिलकुल निशुल्क रखा गया है. इस मूर्ति का निर्माण और रख रखाव एक जापानी बौद्ध संस्था दैजोक्यों करती है.

अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन केंद्र है बोध गया

पड़ोसी देशों में बौद्ध धर्म के विस्तार के साथ ही बोध गया एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन केंद्र बन गया. यहां विदेशी पर्यटकों के रूकने के लिये होटलों की कोई कमी नहीं है. उत्तर भारतीय खाने के साथ यहां कई जापानी, चीनी, थाई और बर्मीज़ रेस्तरां खुल चुके हैं.
साथ ही गया के हवाई अड्डा को भी अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के लिये अपग्रेड किया गया है यहां से चीन, बर्मा, थाईलैंड जैसे देशों से सीधी उड़ानें साल के कुछ महीनों में उपलब्ध रहती हैं. रेलमार्ग से भी गया बेहतरीन तरीके से जुड़ा हुआ है. बोध गया घूमने के लिए सिर्फ एक दिन का समय ही काफी है, इसके बाद आप राजगीर-नालंदा की ओर प्रस्थान कर सकते हैं.

श्राद्ध के लिये पवित्र तीर्थ भी है गया

बिहार और झारखंड की सीमा और फल्गु नदी के तट पर बसा गया तीर्थ श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र स्थान माना गया है हिंदू धर्म शास्त्रों में माना गया है कि पितृपक्ष में इस पवित्र स्थान पर पिण्डदान और श्राद्ध कर्म करने से पितरों की मुक्ति हो जाती है. अपने अपनों को अंतिम विदाई देने के बाद भी अगर उनकी आत्मा की शांति के लिये पूजा करवानी हो तो सितंबर के महीने में पितृ पक्ष के दौरान गया का रूख किया जा सकता है. गया सड़क, रेल और हवाई रास्ते से पूरे भारत से अच्छी तरह जुड़ा है.

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