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पंच-बदरी में से एक बद्री – बद्रीनाथ

पंच-बदरी में से एक बद्री – बद्रीनाथ

अलकनंदा नदी के किनारे बसे उत्तराखंड की वादियों में स्वर्ग के द्वार खोलता बद्रीनाथ मंदिर हिन्दू धर्म के चार धाम में से एक है. बद्रीनाथ मंदिर को बद्रीनारायण मंदिर भी कहते हैं, भगवान विष्णु का एक रूप बद्रीनाथ को समर्पित है. हिन्दू धर्म में अहम पंच-बदरी में से एक बद्री है बद्रीनाथ. उत्तराखंड में पंच बदरी, पंच केदार और पंच प्रयाग पौराणिक दृष्टि से खास अहमियत रखते हैं.

अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक अखण्ड दीप

हिमालय की गोद में बसे बद्रीनाथ में नर-नारायण विग्रह की पूजा होती है और अखण्ड दीप जलता है, जो कि अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक माना जाता है. कहा जाता है कि मोक्ष प्राप्ति के लिये चारों धाम का तीर्थ करना जरूरी है इन्हीं चार धाम में से एक बद्रीनाथ के दर्शन भी सभी पापों से मुक्ति दिलाने का मार्ग हैं.

 

कैसे पड़ा बद्रीनाथ नाम?

इस जगह की पवित्रता का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं लेकिन कम लोग ही इसके इतिहास से वाकिफ हैं. दरअसल बद्रीनाथ क्षेत्र में बदरी (बेर) के जंगल थे, इसलिए इस जगह में स्थित विष्णु के विग्रह को बद्रीनाथ नाम मिला. हालांकि बद्रीनाथ का ये मंदिर ज्यादा पुराना नहीं है. बद्रीनाथ का मंदिर जो आज मौजूद है, उसे रामानुज संप्रदाय के स्वामी वरदराज की प्रेरणा से गढ़वाल नरेश ने पंद्रहवीं शताब्दी के दौरान बनवाया था. बद्रीनाथ मंदिर पर सोने का छत्र और यहां का कलश इंदौर की महारानी अहिल्याबाई ने चढ़वाया था. मंदिर में दो पुजारी होते हैं, वरिष्ठ और कनिष्ठ जिन्हें केरल के नम्बूदरीपाद ब्राह्मण परिवार से ही चुना जाता है.

सर्दियों में बंद हो जाते हैं कपाट

बद्रीनाथ धाम की एक विशेषता इसे बाकी तीन धामों से अलग करती है और वो है यहां के कपाट का सर्दियों में बंद हो जाना. सर्दियों में बद्रीनाथ से भगवान विष्णु का विग्रह उठाकर ऊखीमठ में ले जाया जाता है. कहा जाता है कि ऊखीमठ में भगवान आराम करते हैं यहां भगवान की पूजा नहीं होती.

स्वर्ग का मार्ग खुलता हैं यहां

माना जाता है कि जिसने सैंकड़ों जन्मों में भगवान की आराधना की हो, उसी को बद्रीनारायण भगवान के दर्शन होते हैं. ऐसी भी मान्यता है कि जो भी बद्रीनारायण की परिक्रमा करता है, उसे पृथ्वी दान का फल मिलता है. इतना ही नहीं यहां के तप्तकुण्ड में स्नान कर भगवान का ध्यान करते हुए बद्रीनारायण के दर्शन करने वाले की देवता भी स्तुति करते हैं.

पहाड़ों की गोद में बसा बद्रीनाथ धाम

गंगा नदी की मुख्य धारा के किनारे बसा है ये तीर्थस्थल. हिमालय में समुद्र तल से 3,050 मीटर की ऊंचाई पर है बद्रीनाथ जिससे यहां के मौसम में हमेशा ठंडक रहती है. बद्रीनाथ में सर्दियों में तापमान शून्य से भी नीचे चला जाता है और बर्फ गिरने से यहां तापमान में लगातार गिरावट होती रहती है जिससे यहां बहुत ज्यादा ठंड का एहसास होता है. यहां पश्चिम में 27 किमी की दूरी पर स्थित बद्रीनाथ शिखर कि ऊंचाई 7,138 मीटर है

बद्रीनाथ में और भी धार्मिक स्थल

  1. बद्रीनाथ में ही अलकनंदा के तट पर स्थित है अद्भुत गर्म झरना जिसे ‘तप्त कुंड’ कहा जाता है लोगों की श्रद्धा इस स्थान को भी पवित्र और पूजनीय बनाती है
  2. एक समतल चबूतरा जिसे ‘ब्रह्म कपाल’ कहा जाता है.
  3. पौराणिक कथाओं में उल्लेखित एक ‘सांप’ शिल्ला भी है यहां.
  4. बद्रीनाथ पहुंचे तो शेषनाग की कथित छाप वाला शिलाखंड ‘शेषनेत्र’ देखना ना भूले.
  5. भगवान विष्णु के पैरों के निशान हैं- ‘चरणपादुका’ में
  6. बद्रीनाथ से नजर आने वाला बर्फ़ से ढका ऊंचा शिखर नीलकंठ भी है जिसे ‘गढ़वाल क्वीन’ के नाम से जाना जाता.
  7. माता मूर्ति मंदिर जिन्हें बदरीनाथ भगवान जी की माता के रूप में पूजा जाता है.
  8. माणा गांव जो भारत का अंतिम गांव भी कहा जाता है
  9. वेद व्यास गुफा, गणेश गुफा जहां वेदों और उपनिषदों को लिखा गया
  10. भीम पुल जिसे भीम ने सरस्वती नदी को पार करने के लिये एक भारी चट्टान को नदी के ऊपर रख कर बनाया था
  11. वसु धारा जहां अष्ट-वसुओं ने तपस्या की थी ये जगह माणा से 8 किलोमीटर दूर है कहते हैं जिसके पर इसकी बूंदे पड़ जाती हैं उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं
  12. लक्ष्मी वन लक्ष्मी माता के वन के नाम से प्रसिद्ध है।
  13. सतोपंथ (स्वर्गारोहिणी) कहा जाता है कि इसी जगह से राजा युधिष्ठिर ने सदेह स्वर्ग को प्रस्थान किया
  14. अलकापुरी, अलकनंदा नदी का उद्गम स्थान है जिसे धन के देवता कुबेर का भी निवास स्थान माना जाता है।
  15. सरस्वती नदी के दर्शन भी यहां हो जाएंगे, पूरे भारत में सिर्फ माणा गांव में ही ये नदी प्रकट रूप में है
  16. भगवान विष्णु के तप के बाद उनकी जंघा से एक अप्सरा उत्पन्न हुई जो उर्वशी नाम से प्रसिद्ध हुई. बद्रीनाथ कस्बे के पास ही बामणी गाaव में उनका मंदिर है.

कैसे जाए बद्रीनाथ?

बदरीनाथ का मंदिर पवित्र अलकनंदा नदी के किनारे उत्तराखंड राज्य में हैं, ये जगह हिन्दुओं के एक और पवित्र तीर्थ स्थल ऋषिकेश से 294 किलोमीटर उत्तर दिशा में हैं. देहरादून जॉली ग्रांट हवाई अड्डा यहां का नजदीकी हवाई अड्डा है. बद्रीनाथ तक गाड़ियां जाती हैं, इसलिए यहां मौसम अनुकूल होने पर पैदल नहीं जाना पड़ता. बद्रीनाथधाम को बैकुण्ठ धाम भी कहा जाता है. बैकुण्ठधाम जाने के लिए ऋषिकेश से देवप्रयाग, श्रीनगर, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, चमोली, गोविन्दघाट होते हुए पहुंचा जाता है.

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