एक गरीब बच्चा सिर्फ़ चार साल का अपने पेट की भूख मिटाने के लिए शनिवार को गुरूद्वारे पंहुचा क्योंकि हफ्ते के सिर्फ़ इसी दिन वहां स्पेशल प्रसाद के रूप में काले चने मिलते हैं। पूरे उत्साह के साथ वो भी अन्दर बैठा चुप चाप दो घंटे तक कीर्तन सुनता रहा इस उम्मीद में की अरदास के बाद उसकी भूख मिटेगी। उसे वो मिलेगा जो उसकी ग़रीब मां चाहते हुए भी नहीं खिला सकती। बहरहाल समय गुजरा कीर्तन की गूंज ख़त्म हुई अरदास में अमीरों ने हजारों रुपए दिए। अब बारी थी प्रसाद की तो आगे थे वही आमिर लोग जिनसे गुरूद्वारे का इंतजाम चलता था। वो नन्हा बच्चा पीछे खड़ा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा था.
कुछ मिनटों बाद उसकी बारी आखिरकार आ ही गई उसे प्रसाद मिला लेकर वो काफी खुश हुआ पर उस थोड़े से प्रसाद से उसका मन नहीं भरा आखिर उसे फिर एक हफ्ता इसके लिए इंतजार जो करता पड़ता तो फिर वो एक बार पहुंच गया हाथ फैलाएं लेकिन इस बार उसे वहां से भगा दिया गया क्योंकि भगवान के प्रसाद पर सबका हक होता है ये किसी एक के पेट भरने के लिए नहीं है।
निराश होकर वो बच्चा वहां से चला गया। ये बात शायद कुछ देर बाद वो भूल भी गया होगा लेकिन ये हमें सोचने पर मजबूर करता हैं की हम मन्नत पूरी होने पर हम लाखों रुपए भगवान को चढ़ाते हैं लेकिन किसी ग़रीब को खिलाने के लिए हमारे पास कुछ नहीं। मंदिरों की संपत्ति, गहने करोड़ों पार कर रहे हैं लेकिन गली गली में बच्चे भीख मांगने को मजबूर हैं और जो भीख नहीं मांगते वो चोरी करते हैं
क्यों मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च हर गली मोहल्ले में होते हुए भी लोगों की भूख नहीं मिटा सकते। हिंदू, मुस्लिम, सिख इस के बजाय इन्सान अगर इंसानियत के लिए धार्मिक हो जाए तो भगवान अपने आप खुश हो जायेंगे। ज्यादा कुछ नहीं एक दिन में सिर्फ़ एक आदमी का पेट अगर आप भर दे तो देश में कोई भूखा न सोये। हमें ये याद रखना चाहिए की भगवान पत्थर की मूर्ति में नहीं लोगों के दिल में बसते हैं. उसके बनाये लोगों की सेवा ही सच्ची भक्ति होती है.



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