भक्त और उनकी भक्ति दोनों जिम्मेदार अराध्य को भगवान बनाने के लिये. भगवान से मिलन का रास्ता गुरू दिखाते हैं सही गुरू सही रास्ते पर ले जाता है लेकिन अगर गुरू ही भटकाव की राह पर हो तो कैसे भक्त पार लगेगा?
आस्था.. विश्वास..हमारे आस्थिक देश की सच्चाई है आस्था होना गलत नहीं ये खुद पर विश्वास करने और आगे बढ़ने के लिये जरूरी है लेकिन आस्था के नाम पर जो खिलवाड़ हो रहा है उसे क्या कहेंगे…. बाबाजी जो कहते हैं लोग आंख बंद करके मान लेते हैं लेकिन बाबाजी ही गलत करें तो आस्था का क्या होगा?
डेरे… आश्रम… सतसंग… प्रवचन… जीवन के मूल्यों को बढ़ाने की बातें…विश्वास का एक पूरा समंदर…और इस समंदर से मोक्ष प्राप्ति के रास्ते बताने का मायाजाल… ये हकीकत है कि आस्था जोड़ती है एक दूसरे के लिये संवेदनाओं को जगाती है लेकिन इंसानियत का पाठ पढ़ाते पढ़ाते विवादों के शिकार हुए खुद को संत और बाबा कहने वाले क्या भक्त और भक्ति को बदनाम नहीं कर रहे ?
अपने को भगवान का दर्जा दिलवाने के लिये लंबे समय से लोगों के भारी हुजूम को इकट्ठा कर उन्हें अपना अनुयायी बनाने का ये खेल जारी है. लोगों को सत्संग और कीर्तन के नाम पर अपने पास बुलाना और फिर भीड़ का इस्तेमाल वोट बैंक के लिये करने वालों की कमी नहीं. दान के पैसे से सामाजिक काम कम और अपनी विलासिता की चीजों का ज्यादा संग्रह करने वालों पर कैसे भरोसा किया जाए.
ये सच है कि बाबाओं के कांड एक दिन के नहीं लंबे समय से चल रहे इन गोरखधंधों को उनके भक्त क्यों नहीं देख पाए ये एक और बड़ा सवाल है. सस्ती चीजें अपने अनुयायियों को देने के नाम पर मार्किट में रोजमर्रा की चीजों का ब्रांड कोई एक दिन में नहीं बनता क्यों नहीं भक्तों ने सवाल किया कि ये बिजनेस वो क्यों चला रहे हैं जो दुनिया की सुख सुविधाओं को त्याग का साधा जीवन जीने की नसीहत देते हैं.
कानून के घेरे में फंसे तो कई बाबा लेकिन तब जब सालों से उनके खिलाफ लड़ाई लड़ने वालों ने हार नहीं मानी. दान के पैसों से बाबाओं ने गवाहों और अधिकारियों को खरीदकर न्याय के रास्ते में रोड़े डाले. क्या ये काम कोई बाबा अकेले अपने दम पर कर सकता है क्यों नहीं सेवा के नाम पर बाबा के गैंग के लोगों को भक्तों ने पहचाना? ये भी सच है कि अगर कोई बोलने वाला नहीं होता तो आस्था कभी सफेद चोगे के पीछे छिपी गुफाओं की कालिख को देख नहीं पाती.
अंधभक्ति आंखों पर पट्टी बांध देती है और यही से खड़ा होता है बाबाओं का विशाल साम्राज्य…धर्म कर्म और सामाजिक कामों से जुड़कर एक अच्छा जीवन जीने के सपने दिखाने वाले बाबाओं के पीछे लाखों अनुयायी खड़े हो जाते हैं जिन्हें गलत सही की समझ बाबा के प्रवचनों से ही आती है लेकिन बाबा के कांड जब सामने आने लगते हैं तो ये समझ हिंसक होने से गुरेज नहीं करती. तब कहां जाता है सालों के सुने प्रवचनों का फल?
समर्थकों को आस्था के नाम पर क्या करवा रहे हैं ये बाबा ये पूछने वाला क्यों कोई नहीं है भगवान के नाम पर आस्था और भक्ति को बदनाम करने का सिलसिला क्या यूं ही चलता रहेगा… सवाल इसलिये उठे क्योंकि राजनीति और जनसमर्थन को अपने पक्ष में कर सत्ता के गलियारों में पैठ बनाने का ये खेल सालों से चल रहा है….और इस खेल के सबसे बड़े खिलाड़ी बनते हैं ये बाबा जो अपने सोशल नेटवर्क से वोट बैंक को किसी भी दिशा में मोड़ सकते हैं तो अब इनकर निगरानी आखिर करें तो करें कौन?


Live a Reply