अमृतसर ही नहीं देश की शान है गोल्डन टेंपल. गोल्डन टेंपल को गुरुद्वारा हरमिंदर साहिब के नाम से भी जाना जाता है. सिख धर्म में गोल्डन टेंपल की एक खास जगह है. देश के नक्शे का ये एक प्रमुख तीर्थस्थल है. यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और इस जगह की पवित्रता के दर्शन पूरे भक्ति भाव के साथ करते हैं.
कैसे बना गोल्डन टेंपल ?
गोल्डन टेंपल के साथ कई सदियों का इतिहास जुड़ा है. सबसे पहले 16वीं शताब्दी में 5वें सिक्ख गुरू, गुरू अर्जुन देव जी ने गोल्डन टेंपल को बनवाया था. इसके बाद19वीं शताब्दी की शुरुआत में महाराजा रणजीत सिंह ने इस गुरुद्वारे को गोल्डन टेंपल का ताज दिलवाया. महाराजा रणजीत सिंह जी ने इस गुरुद्वारे की छत को 400 किग्रा सोने के वर्क से ढक दिया, और इसी के बाद इसका नाम स्वर्ण मंदिर पड़ा.
अमृत सरोवर में है आस्था
गोल्डन टेंपल की एक और खासियत यहां का अमृत सरोवर है. संगमरमर से बना ये गुरुद्वारा पवित्र अमृत सरोसर से घिरा हुआ है. यहां की मान्यता यहां आने वाले श्रद्धालु ही बता देते हैं. मंदिर में एंट्री के चार गेट भी खास संदेश देते हैं ये चार प्रवेश द्वार मानवीय भाईचारे और समानता का संदेश देते हैं. भले ही इस मंदिर का महत्व सिक्ख धर्म में ज्यादा हो लेकिन अमृतसर आने वाले भारतीय और विदेशी पर्यटक इससे दूर नहीं रह पाते और ये टूरिस्ट के लिये भी खास आकर्षण का केंद्र बना है. यहां दुनिया भर से लोग पूरे साल आते हैं.
सिखों का देवस्थान है गोल्डन टेंपल
गोल्डन टेंपल या हरमंदिर साहिब को सिखों का देवस्थान भी कहा जाता है. हरमंदिर साहिब बनाने का उद्देश्य सबके लिये एक ऐसी जगह को बनाना था जहां सभी समान रूप से भगवान की आराधना कर सके. बताया जाता है कि तक़रीबन एक लाख 25 हजार से भी ज्यादा लोग रोज़ स्वर्ण मंदिर में आते हैं और गुरुद्वारे का मुख्य प्रसाद ‘लंगर’ ग्रहण करते है.गुरुद्वारे का जो स्वरूप आज दिखता है वो 1764 में जस्सा सिंह अहलूवालिया ने कुछ और सिक्खों के साथ मिलकर पुनर्निर्मित किया था. दरअसल इस मंदिर को कई बार उजाड़ा गया, पहले मुगल और अफगानों ने और फिर भारतीय आर्मी और आतंकवादियों के मनमुटाव में इसे काफी नुकसान पहुंचा. यही वजह है कि इसे सिख धर्म की विजय का प्रतीक भी माना जाता है.
भगवान का घर बना हरमंदिर साहिब
हरमंदिर साहिब के बनने की बात करें तो इसे भगवान के घर के रूप में बनाया गया था. गुरु अमर दास ने गुरु राम दास को एक अमृत टांकी बनाने का आदेश दिया था जिससे सिख धर्म के लोग भी भगवान की आराधना कर सके. उस दौरान गुरु राम दास ने सभी सिखों को अपने इस काम में शामिल किया. उनका कहना था की ये अमृत टांकी ही भगवान का घर है. हरमंदिर साहिब को बनाने हुए गुरु जिस झोपड़ी में पहले रहते थे उसे आज गुरु महल के नाम से जाना जाता है.
अमृतसर के बीचों बीच बना हरमंदिर साहिब
1578 CE में गुरु राम दास ने एक और टांकी की खुदाई की थी जिसे बाद में अमृतसर के नाम से जाना जाने लगा, और बाद में इसी टांकी के नाम पर ही इस शहर का नाम अमृतसर रखा गया था. हरमंदिर साहिब अमृतसर के बीचो-बीच बनाया गया था और यही वजह है कि सभी सिख स्वर्ण मंदिर को ही अपना प्रमुख देवस्थान मानते है.
उत्सवों पर सजता है गोल्डन टेंपल
गोल्डन टेंपल में कई उत्सव धूमधाम से मनाये जाते हैं. अप्रैल में बैसाखी का त्यौहार मनाया जाता है. सिख धर्म के लोग इसी दिन खालसा की स्थापना का उत्सव भी मनाते है. सिखों के कई और दूसरे महत्वपूर्ण दिनों में गुरु राम दास का जन्मदिन, गुरु तेग बहादुर का मृत्युदिन, सिख संस्थापक गुरू नानकदेव का जन्मदिन शामिल है. इन सब दिनों में सिख धर्म के लोग ईश्वर भक्ति करते है.
दीवाली पर यहां दियो और कंदिलो की रोशनी में स्वर्ण मंदिर को सजाया जाता है.




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